धार्मिक स्थलों में पाबंदियों के क्या अभिप्राय ??
हैल्लो दोस्तों ,
अभी हमारे देश में हाल - फिलहाल में क्या हो रहा है ये तो आप जानते ही हैं , और आज मैं उसी सन्दर्भ में बात करने वाला हूँ , देश में धार्मिकता अपने चरम पर चल रही है , पर इस अंधी दौड़ मैं हम कहीं इंसानियत को भूल ना जाये , तो चलिए शुरू करते हैं आज का ब्लॉग |
अभी हाल ही में हरिद्वार में गंगा घाटों पर गैर हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है , वहां विभिन्न स्थानों पर बोर्ड और सूचना पटलों के माध्यम से ये संदेश दिया जा रहा । जब से ये सूचना सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक फैली है उसके बाद से अन्य हिन्दू धार्मिक स्थलों पर भी प्रतिबंध की मांग उठने लगी है। कई धार्मिक संस्थाओं ने सरकार से आगामी होने वाले कुंभ क्षेत्र में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की है।
ये तो हम सभी जानते हैं की भारत में कई सारे धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं , जैसे हिन्दू जो बहुसंख्यक है , मुस्लिम , सिक्ख , ईसाई , जैन , बौद्ध , पारसी इत्यादि | सभी धर्मों के लोग अपने अनुसार मंदिर , मस्जिद , चर्च , गुरुद्वारा इत्यादि का निर्माण करते हैं , उन सभी के लिए ये पवित्र स्थान होता है | यह कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी की ऐसे धार्मिक स्थल उनके अनुयायियों के लिए तीर्थ स्थल ही है , ऐसे में गैर धर्म के लोग जब वहां जाते हैं तो कुछ हद तक स्थलों के पवित्रता की बात भी आती है |
अभी की इस घटना के प्रतिक्रिया के रूप में देखें तो उत्तराखंड में बदरीनाथ और केदारनाथ धाम जैसे भारत के प्रतिष्ठित हिन्दू धार्मिक स्थलों पर भी गैर हिन्दुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का प्रस्ताव लाया जा रहा हैं ,
समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का कहना है कि बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे धाम कोई पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सनातन धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र हैं, जहां प्रवेश को नागरिक अधिकार के बजाय धार्मिक परंपरा के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर इसके उदाहरणों की बात की जाए तो उन्होंने मुसलमानों के पवित्र तीर्थस्थल मक्का और मदीना तथा रोमन कैथोलिकों के पवित्र स्थल वेटिकन सिटी का उदाहरण दिया।
हालांकि ये भी कहा गया हैं कि बौद्ध , जैन, सिक्ख धर्म के लोगों को हिंदू ही कहा जाएगा । ये पाबंदी उनके लिए नहीं रहेगी ।
उत्तराखंड में ही गंगोत्री मंदिर समिति ने पवित्र मंदिर की पवित्रता बनाए रखने के लिए सभी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। यह प्रतिबंध गंगा माता के शीतकालीन निवास मुखबा में प्रवेश करने वाले गैर-हिंदुओं पर भी लागू होगा। समिति के व्यक्तियों का मानना है कि अन्य धर्मों के लोग इन पवित्र स्थानों पर आकर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं।
अगर मुसलमानों की बात की जाए तो कई राज्यों के वक्फ बोर्ड इसके समर्थन में हैं तो कुछ राज्यों के इसके विरोध में , इस तरह एक मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है ।
इस प्रकार के निर्णय को हम तीन प्रकार के नजरिए से देख सकते हैं
1. धार्मिक पवित्रता -
2. आध्यात्मिक दृष्टि -
अगर हम हिंदुओं के आध्यात्मिक दृष्टि की बात करे तो इसमें दर्शन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है , जैसे हिंदू षडदर्शन।
और जहां तक बात दर्शन की है उसका किसी विशेष समुदाय या व्यक्तियों से नाता नहीं है , बल्कि यह हर वर्ग के व्यक्तियों के लिए सार्थक होता है , हिन्दू दर्शन में ज्ञान की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है , हमारे सामने कई सारे उदाहरण प्रस्तुत हैं जिसमें व्यक्ति विशेष का अभिव्यक्ति परिवर्तन , चरित्र परिवर्तन , हृदय परिवर्तन इसी ज्ञान गंगा में डुबकी लगाने से ही हो पाया है , ऐसे में हिंदुओं के विशेष धार्मिक स्थलों को ज्ञान और संस्कृति का भंडार समझकर इसे अन्य व्यक्तियों तक पहुंचाना हमारा कर्तव्य भी है और जिम्मेदारी भी ।
इस हेतु गैर हिन्दुओं के प्रवेश पर पूर्ण रोक हमें इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना सीखा रही है ।
3. संवैधानिक दृष्टि -
अगर बात की जाए संवैधानिक दृष्टि की तो संविधान के उद्देश्य जिसे उसकी आत्मा भी कहा जाता है , उसमें भारत को धर्म निरपेक्ष की संज्ञा दी गई है। अर्थात किसी विशेष जाति , धर्म के प्रति या उसके खिलाफ संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता , इसीलिए सुप्रीम कोर्ट में जब इस प्रकार के विषय जाते हैं तो उनके आदेश में अधिकतर किसी धर्म विशेष के प्रति ना होकर , संबंधित संस्था के समिति पर ही अंतिम निर्णय लेने की बात कही जाती है । या फिर सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप करने की हिदायत दी जाती है ।
तो अगर संक्षेप में कहा जाए तो यह किसी एक संस्था के द्वारा लिया गया निर्णय नहीं हो सकता , बल्कि यह राष्ट्रव्यापी सोच का उदाहरण प्रस्तुत कर देने वाला निर्णय है , और इसका जिम्मा केवल किसी संस्था के हवाले करना सही नहीं होगा , हो सकता है इसके परिणामस्वरूप विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच तीव्र भेदभाव हो या फिर ये हिंसा या उससे भी कहीं ज्यादा गंभीर परिस्थिति को न्योता देने वाला हो सकता है |
सरकार का हस्तक्षेप इसमें बहुमूल्य हो जाता है , क्योंकि उसके अभाव में अनियोजित फैसले भी लिए जा सकते हैं और उसके अवांछनीय परिणाम भी प्राप्त हो सकता है , जो ना खुद हिंदुओं के लिए सही होगा और ना ही गैर हिन्दू लोगों के लिए ।।
तो इस बारें में आपकी क्या राय है , मुझे कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा ||||



क्या आप अपना हिंदुत्व साबित करने ऐसे स्थानों में जाना पसंद करेंगे ?
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